रमाशंकर बरनवाल का जन्म 12 फरवरी 1925 को मझगांवा गांव


एक छोटे से गांव में मझगांवां में पैदा हुए रमाशंकर बरनवाल वैसे तो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, पर देश, समाज व विकास के प्रति उनकी ऊंची सोच थी। इस सोच ने ही उन्हें बाद में ‘रामा बाबू’ का उपनाम दिया। कई तो उनके मूल नाम की जगह केवल इसी नाम से ही जानते थे। 1962 में चीन के आक्रमण के समय उन्होंने प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू को सोने से तौलकर देश की सहायता की थी। गांव के प्रधान, जिला परिषद सदस्य, केन यूनियन डाइरेक्टर से लेकर दो बार नगरपालिका अध्यक्ष रहे और रह जगह अपनी अलग छाप छोड़ी। साहित्यिक व शैक्षणिक गतिविधियों में भी उनका कोई सानी नहीं था।
 रमाशंकर बरनवाल का जन्म 12 फरवरी 1925 को मझगांवा गांव में हुआ। इनके परिवार का व्यापार व कृषि मूल व्यवसाय था। गांव के प्राइमरी पाठशाला से प्रारम्भिक शिक्षा के बाद इन्होंने जिला मुख्यालय पर स्थित मिडिल स्कूल से कक्षा सात की परीक्षा पास की। उनकी पढ़ाई यही तक सीमित रही, लेकिन व्यवहारिक ज्ञान व दक्षता से इन्होंने जवानी के दिनों से ही पहचान बनानी शुरू कर दी। जमींदारी उन्मूलन के बाद वे अपने गांव के प्रधान बने। इस कार्यकाल में उन्होंने अपनी जमीन पर पांच कमरे वाला पंचायत भवन बनवाया। 1915 में गांव में अपने चाचा द्वारा बनवाए गए प्राथमिक विद्यालय के जीर्ण शीर्ण भवन का पुर्ननिर्माण कराया। 1946 में देवरिया के जिला बनने के बाद शहर को नगरपालिका दर्जा मिला। 1952 में हुए नगरपालिका के पहले चुनाव में अपने वार्ड के सभासद चुने गए। उस समय अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव सभासद ही करते थे। उन्हें सभासदों ने नगरपालिका का उपाध्यक्ष चुना। 1957 में हुए चुनाव में रमाशंकर बरनवाल नगरपालिका अध्यक्ष चुने गए। इस कार्यकाल में कई उल्लेखनीय कार्य किए और उनका उपनामा रामा बाबू प्रचलित होने लगा। 1988 में दूसरी बार सीधे जनता द्वारा भारी बहुमत से चुनकर नगरपालिका अध्यक्ष बने। हालांकि इस कार्यकाल में तीन वर्ष तक ही इस पद पर रह पाए। इस बीच 1971 से 1976 तक देवरिया केन यूनियन के डाइरेक्टर रहे। जिला परिषद के सदस्य और उसकी निर्माण उपसमिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। सामाजिक व साहित्यिक गतिविधियों में लगातार सक्रिय रहने वाले रामा बाबू नागरी प्रचारिणी सभा के आजीवन सदस्य के साथ उसके अध्यक्ष, रेडक्रास सोसाइटी के आजीवन सदस्य, देवरिया में 1995 में हुए प्रथम विश्व भोजपुरी सम्मेलन की आयोजन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। व्यापारिक संगठनों में इनकी मजबूत पकड़ रही। तकरीबन सभी व्यापारिक संगठनों ने इन्हें अपना संरक्षक बनाकर खुद को गौरवान्वित महसूस किया। बाढ़ सहित जिले में आयी हर आपदा के समय इन्होंने बढ़चढ़कर लोगों की मदद की। 22 दिसम्बर 2011 को करीब 85 वर्ष की अवस्था में इन्होंने अंतिम सांस ली।

टाउनहाल, शहीद स्मारक, पुस्तकालय की करायी स्थापना, पं नेहरू से कराया था शिलान्यास
रामा बाबू ने 1957 से लेकर 1964 तक नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में पहली बार कार्य किया। इस अवधि में उन्होंने कई उल्लेखनीय कार्य किए, जो आज भी उनकी याद दिलाते हैं। अपने कार्यकाल के शुरूआती दिनों में ही इन्होंने रामलीला मैदान में 1942 की क्रांति के अमर शहीद रामचन्द्र विद्यार्थी, सोना उर्फ शिवराज सोनार, बंधू उर्फ धिन्हू व गोपीनाथ मिश्र की स्मृति में शहीद स्तम्भ का निर्माण कराया। इस स्तम्भ का उन्होंने तत्कालीन गृह, शिक्षा एवं सूचना विभाग के मंत्री पं कमलापति त्रिपाठी से 25 मई 1958 को लोकार्पण कराया। इसी कार्यकाल में उन्होंने नगर के मध्य जमीन खरीदकर टाउनहाल, पार्क व पुस्तकालय का शिलान्यास 14 जनवरी 1962 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू से कराया। इस पार्क को लोकार्पण बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया। पार्क के बीच में फौब्बारों के बीच पं जवाहर लाल नेहरू की प्रतिमा आज भी लगी है। 1988 में अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भवन का भी निर्माण कराया।

 1962 में चीन युद्ध के समय पं नेहरू को उनके वजन के बराबर सोने से तौलवाया
1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। उस समय नागरिकों ने अपने देश की यथाशक्ति मदद की। रामा बाबू के मन में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू को उनके वजन के बराबर सोने से तौलकर देश की मदद करने का विचार आया। रामा बाबू ने उस समय पं सच्चिदानंद तिवारी, मोहन लाल गुप्त आदि को साथ लेकर सोना बटोरना शुरू कर दिया। रामा बाबू व उनके साथियों के सक्रिय प्रयास से पं नेहरू के वजन के बराबर सोना एकत्र हो गया और देवरिया में पं नेहरू को उनके वजन के बराबर सोने से तौला गया। युद्ध के समय उन्होंने नगरपालिका के सभागार में रेडियो की व्यवस्था कर समाचार प्रसारण की व्यवस्था की थी। इस बीच जनता को गलत अफवाहों से सतर्क भी कराया जाता था।

  इंटर कालेज सहित कई स्कूलों की स्थापना की, कई के विकास में किया योगदान
कम पढ़े लिखे होने के बाद भी रामा बाबू का साहित्य व शिक्षा के प्रति गहरा लगाव था। गांव में चाचा द्वारा निर्मित प्राथमिक विद्यालय के जीर्ण- शीर्ण भवन को बनवाने के साथ ही उन्होंने गांव पर ही 1958 में अपने पिता के नाम से गंगा प्रसाद इंटरमीडिएट कालेज की स्थापना की। उस समय उन्होंने कालेज का आकर्षक भवन बनवाया। ई आकार में बने भवन में सभागार, प्रशासनिक भवन, पुष्प वाटिका बनवाया। नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक टाउनहाल में उन्होंने एक हाईस्कूल व इंदिरा गांधी बालिका विद्यालय खोला। साथ ही वार्डो में भूमि खरीदक८र प्राइमरी व जूनियर स्कूलों की स्थापना करायी। अंग्रेजों के समय मझौलीराज के अगया में स्थापित श्रीदेवी श्याम सुंदरी संस्कृत पाठशाला कुछ कारणों से बंद होने की स्थिति में आ गया था। विद्यालय के अध्यक्ष ने रामा बाबू को विद्यालय के संचालन का दायित्व सौंप दिया। रामा बाबू के प्रयास से विद्यालय को राजकीय अनुदान प्राप्त हुआ और यह विद्यालय आज भी चल रहा है। इसके साथ ही वे बाबा राघवदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय प्रबंध समिति के कोषाध्यक्ष के रूप में कई वर्षो तक कार्य किया। संत विनोबा पीजी कालेज के प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष, बाबा राघवदास इंटरमीडिएट कालेज की प्रबंध समिति के जीवन पर्यन्त अध्यक्ष रहे। श्री बैकुण्ठ पवहारी संस्कृत महाविद्यालय व औषधालय के कोषाध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने कार्य किया।

 पैतृक जमीन पर बनवाया प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव को उन्होंने नजदीक से देखा था। उन्होंने अपने गांव मझगांवा में सरकार को अपनी पैतृक जमीन देकर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापना कराया था। बाद में इसे उच्चीकृत कराया और आज वहां 30 शैया वाला उच्चीकृत स्वास्थ्य केन्द्र मौजूद है। इसके साथ ही उन्होंने प्राथमिक विद्यालय व पंचायत भवन के बीच की भवन उपलब्ध कराकर पंजाब नेशनल बैंक की शाखा भी खोलवाया।

  रामा बाबू के कार्यो को आगे बढ़ा रहे हैं उनके पुत्र
रामा बाबू के पुत्र विनय बरनवाल पिता द्वारा सौंपे गए व्यवसाय के साथ उनके सामाजिक कार्यो को भी कुछ हद तक आगे बढ़ा रहे हैं। रामा बाबू जिन साहित्यिक व सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थाओं के सदस्य रहे, उनके पुत्र आज भी उन संस्थाओं से जुड़कर उनके विकास में योगदान कर रहे हैं। हालांकि रामा बाबू की तरह समाज में उनकी सक्रियता नहीं है, फिर भी पिता के नाम को संजोए रखने का प्रयास कर रहे है। विनय बरनवाल कहते हैं कि बाबूजी ने जिस तरह कार्य किया, उस तरह कार्य करना कठिन है। फिर भी उन्होंने हम लोगों को ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा का जो रास्ता दिखाया है, उस पर चलने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं।

  • Home
  • AboutUs
  • Contactus
  • Services
  • Opportunity
  • Privacy
  • Terms/Condition
  • Advertisment
  • Feedback
  • Team